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दलितों को पानी भरने से किया मना, अब गड्ढे का गंदा पानी पीने को हुए मजबूर

कुछ ऐसी ही तस्वीर (प्रतिकात्मक) आज उस राज्य केरल की है जो सबसे ज्यादा साक्षर है। लेकिन कभी-कभी जातिवाद की गहरी जड़ों को शिक्षा नाम के बहुत पैने हथियार से भी नहीं काटा जा सकता। क्योंकि उसकी जड़ें हमारी कल्पना से भी गहरी हैं।

तिरुअंतपुरम के वरकाला में एक तालाब है जो आस-पास के लोगों के लिए पीने के पानी का जरिया है लेकिन अब इस तालाब में कुरवा और ठंड़ार जाति के लोगों को पानी पीने से रोक दिया गया है और वह इसलिए क्योंकि इस तालाब का इस्तेमाल अन्य बड़ी जातियों के लोग जैसे नायर, एझावा और मुस्लिम करते हैं। इस वजह से करीब 10 दलित परिवार तालाब के बाहर गड्ढे से पानी निकालकर पीने को मजबूर हैं।

वहीं, इलाके के वार्ड पार्षद इस छुआ-छूत को आधिकारिक जामा पहनाते हुए दलितों के लिए अलग कुआं बनवाने का फैसला कर लेते हैं। सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस इलाके के विधायक और काउंसिलर सत्तारूढ़ पार्टी CPM से हैं और वो चुप हैं क्योंकि उन्हें अपनी जान का खतरा है। हद है, जिसकी सरकार है उसमें ही गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं है।

आप सोचिए 21वीं सदी का भारत, सबसे साक्षर राज्य केरल और वहां पर प्यास बुझाने के लिए तालाब का सहारा और उस पर भी दलितों से भेदभाव। क्यों किसी भी नेता के लिए लोगों को साफ पानी देना चुनावी मुद्दा नहीं बनता?

दरअसल, लोग हिंदू-मुस्लिम की राजनीति में उलझे हुए हैं और नेता जी को अपनी सभा में रखी मेज पर बिसलेरी की बोतल रखी मिल जाती है और वे पानी पीकर जोर से नारा लगा देते हैं भारत माता की जय…

By- Saurabh Yadav

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