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सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में फर्क

सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में फर्क क्या होता है?

अक्सर सबको लगता है कि सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में कोई फर्क नहीं होता है। लेकिन इनमें बहुत फर्क होता है। तो चलिये जानते हैं कि सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में क्या फर्क है?

सामान्य शब्दों में सैलरी अकाउंट वो खाता है, जिसमें व्यक्ति की सैलरी आती है। बैंक ये खाते कंपनियों और कॉर्पोरेशन के कहने पर खोलते हैं और कंपनी के हर कर्मचारी का अपना सैलरी अकाउंट होता है। उसी बैंक अकाउंट में कंपनी कर्मचारियों की सैलरी डालती है। सैलरी वाले खाते के नियम सेविंग्स से अलग होते हैं।

नहीं रखना होता मिनिमम बैलेंस

वहीं सेविंग्स वाले खाते को पैसे की बचत करने और बैंक में रखने के लिए खोला जाता है। सैलरी अकाउंट में कोई मिनिमम बैलेंस की जरूरत नहीं होती है, जबकि बैंक के सेविंग्स अकाउंट में आपको कुछ न्यूनतम बैलेंस मेंटेन करना होता है।

अगर सैलरी वाले खाते में कुछ निश्चित समय तक सैलरी नहीं डाली गई है, तो बैंक इसे रेगुलर सेविंग्स अकाउंट में बदल देता है। जिसमें मिनिमम बैलेंस की जरूरत होती है। दूसरी तरफ, अगर बैंक मंजूरी देता है, तो आप अपने सेविंग्स अकाउंट को सैलरी अकाउंट में बदल सकते हैं। ये उस स्थिति में आप कर सकते हैं, जब अपनी नौकरी बदलते हैं और ई कंपनी उसी बैंक के साथ आपका सैलरी अकाउंट खोलना चाहता है।

सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में समान ब्याज दर

सैलरी और सेविंग्स अकाउंट पर मिलने वाली ब्याज दर समान रहती है। आपके सैलरी अकाउंट में बैंक लगभग 4 फीसदी की दर से ब्याज देता है। ये अकाउंट आपका एम्प्लॉयर खोलता है, जबकि बचत खाता कोई भी व्यक्ति खोल सकता है।

अगर आपने अपनी नौकरी बदली है, और आपने अपने सैलरी अकाउंट को बंद नहीं किया है और न ही उसे बदला है, तो उसमें मिनिमम बैलेंस बनाएं रखना होगा। ऐसा नहीं करने पर बैंक उस सेविंग्स खाते पर मैनटेनेंस फी या जुर्माना लगा सकता है।

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