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न बेटी पैदा करो, न बचाओ, न पढ़ाओ, पहले समाज को रहने लायक तो बनाओ…

एक तरफ महिला दिवस सेलिब्रेशन चल रहा था और इधर मासूम लहूलुहान हो रही थी… मध्य प्रदेश के इंदौर में एक शॉपिंग मॉल में गुरुवार को 9 साल की बच्ची से बलात्कार का मामला सामने आया है।  जब मैं  ‘बच्ची के साथ बलात्कार’ वाली लाइन पढ़ रही थी तो एक पल के लिए रुक सी गई थी जैसे कि धड़कन रुक जाती है।

 

फिर मन में सोची कि पहली बार तो नहीं है कि मामला इसी खबर के साथ खत्म हो जाएगा। क्योंकि फिर कुछ दिनों बाद ऐसी हैवानियत की खबरें आती दिखेंगी। कब तक आती रहेंगी? इसका जवाब मेरे पास भी नहीं। ये बच्चियां हमारे घर में हैं और आपके घर में भी हैं… डर लगता है ऐसी खबरें सुनकर। सोचती हूं कोई तो जगह बच जाए जहां हमारी बच्चियां इन हैवानों की नजरों से सुरक्षित रहें।

 

माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को पल्लू से बांध कर रखें। मॉल जाना हो, बगीचे में जाना हो या बर्थडे पार्टी-वार्टी में जाना हो, हर कहीं आप उनके गले मे घंटी बांध, पट्टे को अपनी पकड़ में रखें। स्कूल जाना तो साथ हो नही सकता इसलिए जब तक बच्चा स्कूल में है और स्कूल बस में है, तब तक आप भगवान से खुदा से उसकी सलामती की दुआ करें क्योंकि उसके अलावा आपके पास और कोई रास्ता नहीं है। वो सुरक्षित रह गई तो भगवान को नारियल चढ़ाएं या अपने धर्म के हिसाब से जिसमे भी आपका भगवान आपको प्रसन्न होता दिखाई दे।

 

अब तो भगवान भरोसे ही है बच्चों की और लड़कियों की सुरक्षा है क्योंकि समाज को तो हम उनके लिए सुरक्षित बना नही पा रहे हैं। बलात्कार हुआ, खबर पढ़ी, दुख हुआ, ‘च्च च्च च्च’ किया और काम मे लग गए। संवेदनाएं अब समय मांगती हैं जो कि किसी के पास है नहीं। सोचती हूं कि वो बच्ची अब जिन्दगी भर पूरी मर्द जाति से ही डरती रहेगी। शायद इस बात का असर उसके संबंधों पर भी पड़ेगा। कैसे वो भूल पाएगी इस बात को? अपराधी तो आज या कल छूट ही जाएगा।

 

लड़कों को बचपन से सही-गलत की सीख अगर हम दे पाए तो समाज बेहतर बनेगा। इन अपराधियों की मानसिकता समझ कर और उससे सीख लेकर हम वर्कप्लेस में कर्मचारियों पर काम कर पाए तो ठीक, नहीं तो बच्चों को पल्लू से बांध कर घूमना और लड़कियों को तथाकथित ‘मर्यादा’ में ही रखना होगा। अरे काहे का सुरक्षित बचपन और काहे का बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ…

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