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भारत और चीन विवाद

भारत और चीन विवाद को ठीक से समझिये!

लद्दाख की गलवान घाटी में चीन के साथ भारतीय सैनिकों की झड़प हुई। जवान शहीद हुए, देश में हड़कंप मचा और आक्रोश हुआ। सियासत से लेकर सोशल मीडिया में हलचल बड़ी, विपक्ष ने पीएम से दवाब मांगा तो लोगों ने चीनी सामान को बॉयकॉट करने की मांग करने में लगे हैं। भारत और चीन विवाद को ठीक से समझने के लिए आपको दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का इतिहास, सीमा क्षेत्र का भूगोल और इससे जुड़े हुए मुद्दे समझने की जरूरत है।

क्यों है भारत और चीन सीमा विवाद?

भारत और चीन के बीच में सीमा विवाद होने का सबसे बड़ा कारण दोनों देशों के बीच में सीमा से जुड़ा हुआ कोई समझौता नहीं है। इसके अलावा 3 और वजह हैं जिस वजह से वक्त-वक्त पर तनाव होता रहता है।

पहला – तिब्बत

चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। इसके साथ ही चीन ने तिब्बत के साथ साल 1914 में ब्रिटिश भारत के समझौते को मानने से ये कहते हुए मना कर दिया था कि तिब्बत को समझौते का अधिकार ही नहीं था क्योंकि वो हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है। ये समझौता मैकमोहन लाइन के नाम से जाना जाता है। अपनी इसी सोच के कारण चीन अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है।

दूसरा – अक्साई चीन

अक्साई चीन पर चीन ने साल 1962 में कब्जा किया था। भारत अक्साई चीन पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं है और बीच-बीच में तनाव होता रहता है।

तीसरा – वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC – Line of Actual Control)

एलएसी को लेकर दोनों ही देशों में काफी असमंजस की स्थिति है, क्योंकि हिमालयन क्षेत्र होने और सीमा संबंधी समझौते के अभाव में एलएसी की स्थिति कई जगहों पर साफ नहीं हो पाती है। भारत और चीन के सैनिक इस वजह से उलझ जाते हैं और समय-समय पर विवाद देखने को मिलता है।

भारत-चीन सीमा का कैसा है स्वरूप?

भारत-चीन के बीच 3,488 किमी लंबी सीमा है और इसे तीन हिस्सों में देखें तो –

  • एक हिस्सा है उत्तर में जम्मू-कश्मीर
  • दूसरा हिस्सा मध्य में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड
  • तीसरा हिस्सा है पूरब में सिक्किम और अरुणाचल

LAC पर ग्लेशियर, बर्फ के रेगिस्तान, पहाड़ और नदियां हैं। अक्सर दोनों देशों में ये भ्रम पैदा हो जाता है कि उसकी सीमा का उल्लंघन हो रहा है। सड़कों का निर्माण, टेंट बनाना, सैन्य गतिविधि आदि के कारण आशंकाएं बढ़ती चली जाती हैं।

पेंगोंग त्सो, गालवान, नाथूला भारत और चीन विवाद में अहम हिस्से?

पेंगोंग त्सो झील

लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर 14 हजार फुट की ऊंचाई पर अवस्थित पेंगोंग त्सो झील 134 किमी लंबी है। इसका 45 किमी हिस्सा भारत में आता है। भारत की उत्तरी सीमा पर चीन की ओर से एक तिहाई झड़प की घटनाएं इसी इलाके में होती हैं। रणनीतिक तौर पर इसका महत्व है। ये चुशूल घाटी के रास्ते में पड़ता है और इसका इस्तेमाल भारत पर हमला करने के लिए चीन कर सकता है। चीन ने यहां पर कई तरीके के निर्माण किए हुए हैं।

गालवन घाटी

लद्दाख और अक्साई चीन के बीच गालवन घाटी स्थित है और यही वास्तविक नियंत्रण रेखा है जो चीन के दक्षिणी शिनजियांग से मिलती है। साल 1962 में ये इलाका जंग का प्रमुख केंद्र रहा था। हालांकि इस इलाके में निर्माण नहीं करने की सहमति है, लेकिन चीन पहले ही अपने इलाके में सैन्य निर्माण कर चुका है पर भारत को ऐसा करने से रोकता है।

नाथूला दर्रा

14,200 किमी फीट की ऊंचाई पर स्थित नाथुला दर्रा वास्तव में सिक्किम और दक्षिणी तिब्बत के चुम्बी घाटी को जोड़ता है जो कि गंगटोक के पूरब में 54 किमी की दूरी पर है। यहां से कैलाश मानसरोवर की तीर्थ यात्रा के लिए भारतीय जत्था निकलता है। नाथूला दर्रे को लेकर साल 1890 में चीन और ब्रिटिश कालीन भारत के बीच संधि हुई थी। साल 2006 में नाथुला दर्रा तब खोला गया था जब दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते हुए थे।

डोकलाम और तवांग में क्या है विवाद?

डोकलाम

साल 2017 के बाद डोकलाम का महत्व बढ़ गया था। साल 2017 में चीन सड़क बनाने की कोशिश कर रहा था, जिस पर भारत और चीन की सेना 70 दिनों तक एक-दूसरे के खिलाफ डटी रहीं थी। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 2 बार वन टू वन मुलाकात हुई और इसके बाद इलाके में शांति बन सकी थी।

तवांग

अरुणाचल प्रदेश के तवांग को चीन हमेशा से ही तिब्बत का हिस्सा मानता आ रहा है। सांस्कृतिक समानता और बौद्ध तीर्थस्थल से जोड़कर भी वो अपने दावे को पेश करता है। साल 1914 में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच हुए समझौते में अरुणाचल के उत्तरी हिस्से तवांग और दक्षिणी हिस्से को भारत का हिस्सा मान लिया गया था। साल 1962 में चीन ने तवांग पर कब्जा कर लिया था लेकिन भौगोलिक स्थिति अनुकूल नहीं रहने की वजह से उसने वहां से लौटना सही समझा।

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