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क्या द्रौपदी हैं भारत की पहली फेमिनिस्ट औरत?

ये बात पिछले साल की है जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने द्रौपदी को दुनिया की पहली फेमिनिस्ट (नारीवादी) कहा था। उन्होंने कहा था कि द्रौपदी के पांच पति थे और वो पांचों में से किसी की बात नहीं सुनती थीं। वो सिर्फ अपने दोस्त की सुनती थीं और वो थे भगवान श्रीकृष्ण।

 

जिन पौराणिक कथाओं पर मुग्ध होकर राम माधव अपने इस सुसंस्कृत राष्ट्र की पहली नारीवादी के रूप में पांचाली को देखते हैं वही कथाएं तमाम ऐसे आधार देती हैं जिनमें द्रौपदी एक असमान समाज के हाथों की कठपुतली भर नजर आती हैं। यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक समझती हूं कि “किसी की न सुनने वाली” नारीवादी होने का न कोई पैमाना है और न ही कोई नियामक।

 

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जब अर्जुन अपने भाईयों के साथ द्रौपदी को मां कुन्ती से मिलवाने लाए तो मां ने बिना देखे ही कह दिया कि जो भी हो आपस में बांट लो। कुन्ती ने द्रौपदी को देखा तो अपनी बात पर अफसोस भी किया लेकिन उस समय अर्जुन के लिए मां के शब्द कमान से निकला हुआ तीर थे, उनकी आज्ञा मानी गयी और पांचाली को पांचों भाईयों ने बांटा।

 

जब एक औरत की काया को पांच भाईयों ने साझा किया था जब उसी काया में समाहित आत्मा की सुध किसी ने न ली। स्वयं द्रौपदी ने भी कोई विरोध नहीं किया। यहां यह परिभाषा गढ़ लेना भी गलत होगा कि वो उस युग में 5 पतियों के साथ रहती थीं इसलिए रूढ़ीवादी नहीं, प्रगतिवादी थीं क्योंकि पांच पतियों के साथ रहना उनकी अपनी इच्छा नहीं थी। बिना इच्छा के कई लोगों के साथ संभोग करने की इस प्रक्रिया से यदि नैतिकता का लिहाफ हटा दें तो आपको द्रौपदी एक सेक्स स्लेव नजर आएंगी।

 

दूसरी ओर कहा जाता है कि वो हर एक वर्ष बाद फिर से कौमार्य प्राप्त कर लेती थीं। यह कथन उस युग के औरतों की कहानी कहने को पर्याप्त है। एक औरत पांच लोगों में बंटती रही पर चूंकि उसका कौमार्य बारंबार आता रहा, किसी ने उसके बारे में कुछ न सोचा। उसकी कामना, अभिलाषा, सपनों की गठरियां, मांसपेशियों से गुथा शरीर और उन्हीं मांसपेशियों के बगल के गुजरती धमनियों में प्रवाहित रक्त तक के बारे में न सोचा गया क्योंकि वह हर वर्ष कौमार्य प्राप्त कर सकती थी और यही एक औरत की संपत्ति है।

 

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दुर्योधन से शतरंज में पराजित होने पर द्रौपदी का भरे दरबार में तिरस्कार हुआ। दुशासन उनका चीर-हरण कर रहा था और उनके पांच पति विवश बैठे थे। तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को याद किया। इस वक्त भी वो एक लाचार महिला ही थीं जो अपने पतियों के समक्ष अपना वह हश्र देख रही थी। इसे लेकर कभी भी उन्होंने पांडवों का विरोध नहीं किया।

 

महाभारत का कारण द्रौपदी को बताया जाता है पर महाभारत द्रौपदी की अस्मिता की नहीं, पांडवों के प्रतिष्ठा की लड़ाई थी। द्रौपदी उसमें एक सूचक मात्र थीं।

 

Note: यह पोस्ट रीवा सिंह ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है।

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