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CAA और NRC में क्या संबंध है?

ये (CAA) सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट 2019 (नागरिकता संशोधन कानून 2019) कौन सी समस्या दूर करने जा रहा है। इस अमेंडमेंट एक्ट से क्या-क्या बदलाव आएंगे। इस अमेंडमेंट एक्ट से लोगों को क्या-क्या समस्या हो रही है। इन सबके बारे में बिल्कुल गैर-राजनीतिक और बिना आलोचना के बात करेंगे। अलग से दूसरी स्टोरी में राजनीतिक एंगल और आलोचनात्मक संदर्भ में भी बात करेंगे। तो चलिए शुरू करते हैं-

सबसे पहले इसे समझने के लिए इन दो शब्दों का मतलब समझना बहुत जरूरी है।

पहला है Persecution- इसका सीधा मतलब होता है अत्याचार करना, हिंसा करना (Violence), भेदभाव (Discrimination) करना।

अगर एक ग्रुप के ऊपर दूसरा ग्रुप हिंसा और भेदभाव करें तो उसे Persecution कहते हैं। उत्पीड़न बहुत सारे तरीके के हो सकते हैं जैसे- धार्मिक आधार पर अत्याचार, राजनीतिक अत्याचार, भेदभाव इत्यादि।

दूसरा इस टॉपिक के लिए जरूरी शब्द है- Immigrant (आप्रवासी)

अगर कोई इंसान अपना देश छोड़कर दूसरे देश में हमेशा के लिए रहने आ जाए तो वो उस देश का Immigrant हो जाता है।

अब समझेंगे भारत का अपने पड़ोसी देशों के साथ जो रिश्ता है, अब उसे समझेंगे। जो बहुत ही जरूरी है।

12th से 20th सेंचुरी के दौरान ईरान में धार्मिक उत्पीड़न के चलते, ईरान के पारसियों का भारत में बड़े स्तर पर माइग्रेशन (देशान्तरण) हुआ।

1947 में भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। जिसके चलते एक करोड़ लोगों का आना जाना हुआ और इसी बंटवारे की वजह से 1960 से 1971 के बांग्लादेश युद्ध तक लाखों बांग्लादेशियों का भारत आना हुआ था। इसके बाद, 1959 से 1960 के चीन तिब्बत युद्ध के चलते तिब्बतीयंस  का भारत आना हुआ और 1979 से सोबियत अफगान युद्ध के कारण वहां पर चल रहे धार्मिक दुर्व्यवहार के चलते अफगानियों का भारत आना हुआ। इसी तरह, 1980 से 2000 में श्रीलंका में सिविल वॉर के वक्त श्रीलंकन तमिल्स का भारत आना हुआ और 2015 से 2017 के बीच, मयंमार के रोहिग्यास का भारत में माइग्रेशन हुआ।

2001 की सेंसेक्स की रिपोर्ट के हिसाब से भारत में सबसे ज्यादा माइग्रेंस बांग्लादेश से और फिर पाकिस्तान से आए हैं।

भारत में जो नागरिकता का जो मुद्दा है इसे दो जगह जिक्र किया गया है।

भारत के संविधान में और सिटिजनशिप ऑफ इंडिया एक्ट 1955 में।

संविधान ये कहता है कि 1950 को कौन-कौन भारतीय नागरिक होंगे।

संविधान के जो प्रोविजन है वो हमारे दादा, परदादा के लिए जरुरतमंद था। लेकिन उसके बाद के जो भी प्रोविजन है जैसे 1950 के बाद कौन भारतीय नागरिक बनेगा, आज कैसे बन सकते हैं या आने वाले समय में कैसे भारतीय नागरिकत हासिल की जा सकती है। इन सारी चीजों का जिक्र सिटिजनशिप ऑफ इंडिया एक्ट 1955 में किया गया है ।

अब सवाल है इस नए एक्ट का मकसद क्या है?

दरअसल, वर्तमान में जो नागरिकता हासिल करने के लिए एक्ट है यह बिल उसे बदलना चाहता है।

आप सोच रहे होंगे कैसे?

तो जवाब है कि सबसे पहले अवैध प्रवासियों की परिभाषा बदल दी गई।

जो एक्ट है वो अवैध प्रवासियों को पहले इस प्रकार परिभाषित करता था कि अगर कोई भी इंसान भारत में बिना वैध पासपोर्ट के या फ्रॉड डोक्यूमेंट दिखाकर या जितने समय के लिए उसे परमिशन मिली थी और उसे दिखाकर इससे ज्यादा समय तक भारत में रह रहे हो, तो आप अवैध प्रवासी कहलाओगे और आपको देश से निकाला जा सकता है।

यह एक्ट कहता है कि 31 दिसंबर, 2014 से पहले जो भी लोग जिस भी तरीके से भारत में आए हैं। अगर वो अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए हैं और वो ये 6 समुदाय (हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और पारसी) से ताल्लुक रखते हैं तो वो लोग अब अवैध प्रवासी नहीं कहलाएंगे।

दूसरा बड़ा बदलाव नागरिकता पाने की प्रकिया में आ रहा है। पहले ये होता था कि मान लीजिए आप पाकिस्तान से भारत नागरिकता हासिल करने आ रहे हैं, तो पहले आपको 11 साल भारत में गुजारने होंगे या नौकरी करनी पड़ेगी और इन 11 सालों के बाद ही आपको भारतीय नागरिकता मिलेगी।

ये बिल इस पूरी प्रक्रिया को ही बदल देता है और ये कहता है कि अगर आप अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से हैं और इन तीन देशों में हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और पारसी धर्म के हैं, तो अब आपको 11 साल नहीं बल्कि सिर्फ 5 साल भारत में बिताने होंगे और आपको भारतीय नागरिकता मिल जाएगी। इसी हिसाब से दिसंबर, 2014 की तारीख तय की गई है। दिसंबर, 2014 से लेकर 2019 पांच साल पूरे हो जाते हैं और ये सारे अवैध आप्रवासी भारतीय नागरिक के रूप में बदल जाएंगे।

 

CAA में परेशानी क्या है?

इस CAA एक्ट को लेकर जो पहली बड़ी समस्या आ रही है वो ये है कि आपने इन तीन देशों को क्यों चुना और तीन देशों के इन 6 समुदाय के लोगों को ही क्यों? बाकी पड़ोसी देशों और बाकी धर्म के समुदाय को क्यों नहीं शामिल किया? यह संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है।

अमित शाह ने कहा कि हमारे पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक समुदाय का शोषण हो रहा है, उन पर हमला हो रहा है और उनके साथ धार्मिक आधार पर दुर्व्यवहार हो रहा है। तो अब आपके मन में सवाल होगा कि फिर इन देशों को ही क्यों चुना? क्योंकि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश का जो संविधान है वो इन्हें सेक्युलर नहीं, बल्कि एक इस्लामिक देश बनाता है। इन तीन देशों में हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और पारसी धर्म के लोग अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं और इनका धर्म के आधार पर भेदभाव और शोषण हो रहा है।

दूसरा बड़ा विरोध इस पर भारत के नॉर्थ ईस्ट से, खासतौर से असम से आ रहा है। इस विरोध के पीछे भी एक इतिहास है। चलिए जानते हैं-

साल 1920 से जब देशभर में दंगे होने शुरू हो चुके थे तभी से ही ईस्ट बंगाल से नॉर्थ ईस्ट के शहरों में, खासतौर से असम में आना शुरू हो चुका था। जाहिर सी बात जो लोग वहां आ रहे थे वो वहां के संसाधनों पर जैसे जमीन पर अपना हिस्सा जमाना शुरू कर दिए थे। धीरे-धीरे ये हुआ कि यहां के लोकल लोगों की संख्या की तुलना में शरणार्थियों की संख्या ज्यादा बढ़ने लगी।

इसके बाद 1948 के भारत पाकिस्तान बंटवारे से लेकर 1971 के बांग्लादेश के गठन तक लाखों लोगों का नॉर्थ ईस्ट के शहरों में आना हुआ। नॉर्थ ईस्ट के जो शहर थे वो अपने संस्कृति, भाषा और आदिवासी लोगों के वजूद को लेकर बहुत चिंतित थे। इसी तरह, जम्मू और कश्मीर की तरह नॉर्थ ईस्ट के राज्यों को भी विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है।

अब क्या होता है कि 1978 में असम के MP हीरालाल पटवारी की मृत्यु हो जाती है। जिस वजह से दोबारा चुनावा करवाने होते हैं। तब ये सामने आता है कि जो असम के रजिस्टर्ड वोटर्स हैं उनकी संख्या अचानक से बढ़ जाते हैं, मतलब शरणार्थियों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। चुनाव रद्द कर दिए जाते हैं और स्टूडेंट लीडर्स धरना-प्रदर्शन पर उतर आते हैं कि जो अवैध घुसपैठ है इसे रोका जाए और जितने भी अवैध आप्रवासी है उन्हें पकड़कर देश से निकाल दिया जाए। ये असम आंदोलन था जो 1979 से 1985 तक चला और इसी का परिणाम था असम समझौता, जो 1985 में आया।

असम समझौता ये कहता है कि चाहे आप किसी भी धर्म के हो, अगर आप 24 मार्च 1971 के बाद असम में आए हैं तो आप नागरिक नहीं कहलाएंगे। आप अवैध आप्रवासी ही कहलाएंगे। इसी असम समझौते के उद्देश्य को पूरा करने के लिए NRC (नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजनशिप) लाया गया था जिसमें 19 लाख अवैध आप्रवासी पाए गए थे और इस लिस्ट में हिन्दू सहित सभी धर्म के लोग शामिल थे।

लेकिन जो अब CAA आया है, वो कहता है कि 1971 से नहीं देखेंगे बल्कि 2014 से देखेंगे। साल 2014 तक इन 3 देशों से और इन 6 धर्मों (मुस्लिम छोड़कर) से जो भी लोग भारत में आए हैं वो अवैध आप्रवासी नहीं कहलाएंगे और इन्हें नागरिक कहा जाएगा।

तो ये था सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट। ये किस समस्या को दूर करना चाह रहा है और लोगों को इस एक्ट से क्या समस्या हो रही है। उम्मीद करता हूं कि आपको CAA समझ आया हो और हमारा समझाना आपको पसंद आया हो।

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