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this lady built museum

Sexual Assault हुई महिलाओं के कपड़ों से इस महिला ने बनाया एक म्‍यूजियम…

लड़कियों के साथ बलात्‍कार की, छेड़छाड़ की खबरें तो अब मानों एक दिन का हिस्सा बन गया है। वक्त चाहे कितना ही बदल गया हो या एडवांस टेक्नोलॉजी से हम जितना मर्जी लैस क्यों न हो जाएं। लेकिन सोच तो आज भी वही छोटी रह जाती है। इसी छोटी सोच का नतीजा है कि महिलाओं के लिए हालात कभी नहीं बदले हैं। कितने ही कानून बने लेकिन लड़कियों से जुड़ी समस्याएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही है।

 

लोगों की मानसिकता आज भी नहीं बदली, जब भी रेप या छेड़खानी जैसी वारदातें होती है तो सबसे पहले लोग इस बात के लिए जिम्‍मेदार लड़कियों के पहनावे को मानते हैं। लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं होता कि एक साड़ी पहनी हुई लड़की का रेप क्यों हो जाता है। वो तो हमारी परंपरा का हिस्सा है।  इसका जवाब आपके पास नहीं होगा।

 

अब तो आलम ये है कि 2 साल की बच्ची का या अब 8 महीने की बच्ची तक का रेप हो जा रहा है। पता नहीं ये हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो वो वक्त दूर नहीं है कि शायद बच्ची के पैदा होते ही कोई उसका रेप कर दें।

 

लेकिन तब भी कमी लड़की में ही होगी। उस 8 महीने की बच्ची में होगी जो सही से बोल भी नहीं पाती। इसी तकलीफ को बैंगलुरु की जैस्‍मीन पाथेजा ने समझा है और लोगों को इससे वाकिफ कराने की कोशिश कर रही हैं कि इस तरह के अपराध में कपड़ों से कुछ लेना-देना नहीं होता है बल्कि घटिया और गिरी हुई सोच इसके लिए जिम्मेदार है। वो लोग जिम्मेदार है जो लड़कियों को एक वस्तू समझते हैं।

 

खैर इस पर तो मन में जितना हैं उतना अगर लिखना शुरु हुआ तो कोई अंत नहीं होगा हम बात करते हैं जैस्मीन की जो एक आर्टिस्ट और एक्टिविस्ट है। वो महिलाओं के कपड़ों से जुड़ी लोगों की मानसिकता के खिलाफ काम करती है। तो आइए जानते है कैसे?

this lady built museum

 

इसके लिए जैस्मीन ने सेक्सुअली असॉल्टेड लड़कियों के कपड़ों को जमा करना शुरु किया और वो अभी तक करती हैं। अपने घर का एक कमरा म्यूजियम के रूप में तब्दील किया जहां हर तरफ ऐसे कपड़े आपको दिखेंगे जो आम लड़कियां अपने रोजाना के रूटीन में पहनती है, लेकिन इन कपड़ों के पीछे अपनी-अपनी कहानी हैं। आपको यहां ऐसी लड़कियों के कई कपड़ें मिल जाएंगे जो किसी तरह की वारदात का शिकार हुई है।

 

स्कूल यूनिफॉर्म से गाउन तक

इनके कलेक्शन में स्कूल यूनिफॉर्म से लेकर गाउन तक, आपको हर तरह के कपड़े मिल जाएंगे जिसे देखकर आपको लगेगा कि ऐसी मानसिकता के साथ क्राइम करने वाले लोग उम्र नहीं देखते है। आज हर उम्र की लड़कियां या महिलाएं सेक्सुअल असॉल्ट का शिकार हो रही है।

 

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आई नेवर आस्क फॉर इट’ कैम्‍पेंन

इतना ही नहीं, इन्हें देखकर आप ये मानेंगे कि ऐसी हरकतों के पीछे कपड़ों का कोई हाथ नहीं होता है। लोगों की इसी मानसिकता के खिलाफ लड़ते हुए जैस्‍मीन ने अपने इस कैम्पेन का नाम ‘आई नेवर आस्क फॉर इट’ रखा है। उनके इस कैम्‍पेन को सोशल मीडिया से काफी सर्पोट मिल रहा है।

 

जैस्‍मीन ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे यौन हिंसा के लिए साल 2003 में ब्‍लैक नॉइस नाम की एक संस्‍था बनाई थी। इस संस्‍था में उन्‍होंने पहले किशोरावस्‍था की लड़कियों के लिए काम करना शुरू किया जिसमें वो महिलाओं को सर्तक करने के साथ असामाजिक तत्‍वों के खिलाफ मुहिम चलाती थी। रेप या लड़कियों का शोषण एक गंभीर समस्या है। सेक्‍सुअल असॉल्‍ट की शिकार लड़की के कपड़ों को जिम्मेदार ठहराने की इस प्रथा को खत्म करने के लिए किसी को शुरूआत करने की जरूरत थी और जैस्मीन ने इसकी नींव रख दी है।

 

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