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BLOG: पलायन और बेरोजगारी का दंश झेलता उत्तराखण्ड

पहाड़ दूर से बहुत सुन्दर लगते हैं। करीब जाइए तो उनकी हकीकत समझ में आती है। अपनी आंखों के सैलानीपन से बाहर आकर आप देखेंगे तो पाएंगे कि पहाड़ की जिन्दगी कितने तरह के इम्तिहान लेती है। यह बदकिस्मती नहीं, विकास की बदनीयती है कि इन दिनों पहाड़ के संकट और बढ़ गए हैं। पहाड़ आज की तारीख में बेदखली, विस्थापन और सन्नाटे का नाम है। सदियों से पहाड़ की यही कहानी और यही सच्चाई भी है। यदि इसी प्रकार पलायन बढ़ता गया तो गांवों में इंसान नहीं जानवर देखने को मिलेंगे। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गढ़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन।

 

एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2011 की जनगणना में कहा गया था कि 2001 में पहाड़ी इलाकों में 53 प्रतिशत लोग थे। लेकिन 2011 में इन पहाड़ी इलाकों मात्र 48 प्रतिशत ही लोग रह गए। NSSO का 70वां सर्वे बताता है कि उत्तराखण्ड में कृषि उपज की कीमत राष्ट्रीय औसत से 3.4 गुना कम है। उत्तराखण्ड में औसत कृषि उपज कीमत 10,752 रुपए प्रति परिवार थी। जबकि कृषि उपज कीमत का राष्ट्रीय औसत 36,696 रुपए। अगर पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश की बात की जाए तो खेतिहर परिवार की आय हिमाचल से लगभग आधी है। उत्तराखण्ड में एक खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 4,701 रुपए थी। जबकि हिमाचल में खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 8,777 रुपए थी।

 

कृषि प्रधान देश होने के नाते कई सीखें विरासत में हमें मिलीं, पर हम उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। हमारे खेत छोटे हैं, बिखरे पड़े हैं और जहां गांवों में पलायन हो चुका है वहां खेत बंजर और खाली पड़े हैं। सरकार चाहे तो एक मजबूत योजना बनाकर उस बंजर या खाली पड़ी कृषि योग्य भूमि पर वैज्ञानिक तरीकों से कृषि करवा सकती है। यह कई स्तर पर रोजगार बढ़ाने का प्रयास हो सकता है। पाली हाउस तकनीकों से ज्यादा से ज्यादा सब्जियां उगाने पर ध्यान दिया जा सकता है। हिमाचल हमारे लिए एक उदाहरण है कि कैसे वहां कृषि को फलों की तरफ मोड़कर समृद्धि हासिल की गई।

 

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद बनी किसी भी सरकार ने इस गम्भीर समस्या के समाधान के लिए ईमानदार पहल नहीं की। बल्कि मैदानी इलाकों को तेजी से विकसित करने की सरकारी नीति से असंतुलित विकास की स्थिति पैदा हो गई। पहाड़ के गांवों से होने वाले पलायन का एक पहलू और है। वह है कम सुगम गांवों और कस्बों से बड़े शहरों अथवा पहाड़ों की तलहटी पर बसे हल्द्वानी, कोटद्वार, देहरादून, रुद्रपुर और हरिद्वार जैसे शहरों का होता बेतहाशा पलायन।

 

मैदानी इलाकों में रहकर रोजगार करने वाले लोग सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने गांवों में दुबारा वापस जाने से ज्यादा किसी शहर में ही रहना ज्यादा पसंद करते हैं। स्थिति जितनी गम्भीर बाहर से दिखती है असल में उससे कहीं अधिक चिंताजनक है। इन बेरोजगार पैदा करने वाली फैक्ट्रियों के उत्पाद के साथ कुछ मात्रा में हाईस्कूल फेल-पास ग्रामीणों की जमात भी अभी तक महानगरों की ओर भाग रही है। यह स्वीकार करना होगा कि अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद पलायन की रफ्तार और संख्या में थोडा बहुत कमी जरूर दर्ज हुई, लेकिन इस कमी को उच्च शिक्षित जमात ने पूरा कर दिया है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं राजनीतिक दल लाखों की नौकरियों की बात करते हैं।

 

जब 9 नवम्बर, 2000 को उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ तो उस साल केवल दो महीने के भीतर उत्तराखण्ड में 2,70,114 बेरोजगार रजिस्टर्ड हुए थे। बदले में 37 युवाओं को रोजगार मिल पाया था। उसके अगले साल 3,13,185 बेरोजगारों की तुलना में 836 को रोजगार मिला था। बात रोजगार की हो रही है तो साल 2005 रोजगार के हिसाब से बेरोजागरों के लिए सबसे धनी साल रहा। उस साल 3,80,217 रजिस्टर्ड बेरोजगारों की तुलना में 6,094 बेरोजगारों को रोजगार मिला। साल 2007 में 3,856 युवाओं को रोजगार मिला। साल 2006 में 3,169 और साल 2002 में 2,930 बेरोजगारों के रोजगार के सपने पूरे हुए।

 

सच्चाई यह भी है कि बेरोजगारी के मुद्दे पर ईमानदार कोशिश हुई ही नहीं। हुक्मरान तो सिर्फ ‘सत्ता’ के खेल में उलझे रहे। जिन पर राज्य के भविष्य की जिम्मेदारी रही वे सिर्फ अपनी तरक्की के फेर में व्यस्त रहे। बेरोजगार युवाओं की तस्वीर इस बात की बानगी है कि आज पढ़ाई-लिखाई कामयाबी की गारंटी कतई नहीं है। सेवायोजन विभाग में पंजीकृत बेरोजगारों के आंकड़ों की बात करें तो दून में सबसे अधिक 1,72,136 बेरोजगार हैं। ये बेरोजगार 4-5 सालों से रोजगार की आस लगाए बैठे हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये शिक्षित नहीं हैं। इनकी शैक्षिक योग्यता पर नजर डालें तो 48 फीसद बेरोजगार ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं। देहरादून जनपद में कुल बेरोजगारों में 10वीं पास महज 26,380 हैं, जबकि पोस्ट ग्रेजुएट बेरोजगार की संख्या 28,993 है।

 

उत्तराखण्ड में सरकार कोई भी रही हो हर सरकार में बेरोजगारों के नाम पर सिर्फ छल हुआ। चुनाव के समय हर दल ने वायदे किए, लेकिन जब वायदों को पूरा करने की बारी आई, तो किनारा कर गए। साफ है कि राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, जिन्हें छोटी-छोटी नौकरियों की तलाश है। हालात बेहद चिंताजनक हैं। आज बेरोजगारी चरम पर है। पढ़े-लिखे युवा बेरोजगार भटक रहे हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। लोग नियमित आमदनी में घर नहीं चला पा रहे हैं। सच्चाई यह है कि पहले आपदा, फिर नोटबंदी और अब GST लागू होने के बाद बेरोजगारी का आंकड़ा और तेजी से बढ़ रहा है। राज्य में बढ़ती बेरोजगारी किसी गम्भीर चुनौती से कम नहीं, यह सरकार लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति है। यदि देवभूमि में बढ़ती बेरोजगारी को लेकर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो इसके दूरगामी परिणाम राज्य के भविष्य के लिए घातक भी हो सकते हैं।

 

नोट- इस ब्लॉग को लिखने वाले आशीष रावत एक स्वतंत्र पत्रकार और भारत नीति प्रतिष्ठान से संबंधित हैं। यदि आप भी कुछ लिखना चाहते हैं तो फेसबुक पर मैसेज में या theindianclick@gmail.com पर हमें मेल भेज सकते हैं।

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