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If LIC bankrupt

अगर LIC दिवालिया हो गई तो..?

कल्पना करें कि किसी दिन लाइफ इन्शुरन्स कॉरपोरेशन (LIC) का सबसे बड़ा हाकिम किसी टीवी चैनल पर मुंह लटकाए घोषणा करे कि हमारी कम्पनी दिवालिया हो गई है…. या, कोई राष्ट्रीयकृत बैंक लंबा पसर जाए कि हमारे पास जमाकर्त्ताओं को देने के लिये पैसे नहीं हैं।

 

अभी ऐसी कल्पना ही सिहरा देती है। लेकिन, हमारी अर्थव्यवस्था जिस प्रकृति में ढलती जा रही है, ऐसी संभावनाएं बनी रह सकती हैं। जब आप तीव्र ग्रोथ के फार्मूले तलाशेंगे और रिस्क लेंगे तो…इसके लिये भी तैयार रहना चाहिये कि कभी उल्टा भी हो सकता है। आप अर्थव्यवस्था को जितना मुक्त करेंगे, रिस्क फैक्टर उतना ही बड़ा होता जाएगा। निर्भर इस पर करता है कि देश और देश के लोगों की झटका सहने की कितनी क्षमता है।

 

अमेरिका में, यूरोप के धनी मानी देशों में कुछ वर्ष पहले बड़ी बड़ी कंपनियां, बड़े बड़े बैंक अचानक से धराशायी होने लगे। पता चला… कि तेज ग्रोथ के चक्कर में, बाजार को गतिशील बनाये रखने की कोशिश में बैंकों ने कुछ अधिक ही होशियारी दिखाई, कुछ अधिक ही रिस्क लिया। अब रिस्क तो रिस्क है। मामला उल्टा पड़ा और लेने के देने पड़ गए। नतीजा… बैंकों में ताले और बाहर बेचैन जमाकर्त्ताओं की भीड़। कोई बेहोश हो रहा तो किसी को हर्ट अटैक। शेयर मार्केट में अफरातफरी। शेयरों के भाव गिरे तो गिरते ही गए। कम्पनियां धराशायी होने लगीं। लोग बेरोजगार होने लगे। कितने मर गए सदमे से, कितने बर्बाद हो गए, कितनों ने आत्महत्या कर ली।

 

वह अमेरिका और यूरोप के ऐसे धनी देशों का मामला था, जिन्होंने औद्योगिक और उपनिवेशवादी दौर में अकूत संपदा हासिल कर ली थी, जिनकी आबादी काबू के बाहर नहीं थी। हम यूरोप नहीं हैं। अमेरिका तो नहीं ही हैं। हम भारत हैं। यहां 90 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिनके रुपये बैंक में जाम हो जाएं तो सांस घुटने लगे, डूब जाएं रुपये तो प्राण संकट में आ जाए। नौकरी छूट जाने के बाद खुद को, परिवार को संभाल पाने की स्थिति में ही नहीं रह जाएंगे हम।

 

दरअसल, अर्थव्यवस्था की विसंगतियों से मिले झटके झेलने की क्षमता हम में है ही नहीं। न यूरोपीय देशों की तरह हमारे देश की औकात है कि बेरोजगारी भत्ता दे, झटकों से उबरने में मदद करे। हम अति उर्वरा मां भारती की संतानें हैं। लगभग 135 करोड़। जल्दी ही हम चीन को पछाड़ कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी बनने वाले हैं। इनमें आधे तो बाकायदा फटेहाल हैं। न ठीक से खाना, न कपड़ा, न शिक्षा, न इलाज। दुनिया में सबसे अधिक कुपोषण हमारे देश में… बच्चों में भी, माताओं में भी। दुनिया में सबसे तेज बढ़ती आर्थिक विषमता हमारे देश में। तब भी, हम अतिरिक्त होशियारी दिखाने वाली आर्थिक राह पर बढ़ते चले जा रहे हैं।

 

साहब जापान में घोषणा कर आए हैं कि हम भारत को दुनिया की सर्वाधिक मुक्त अर्थव्यवस्था बना देंगे। वे वहां अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को पटा रहे थे कि आओ…हमारे बैंक खरीदो, हमारे रेलवे स्टेशन खरीदो, हमारी बीमा कम्पनियों में पैसा लगाओ, हमारे यहां से सस्ते आलू खरीद कर हमीं को महंगे चिप्स बेचो…आदि आदि।

 

दुनिया की सर्वाधिक मुक्त अर्थव्यवस्था का मतलब है बैंकों, बीमा कंपनियों, अस्पतालों, शिक्षा संस्थानों आदि में बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के बाजार की शक्तियों का प्रभुत्व। वे अपने फैसले खुद लेंगे और इन फैसलों में देश की आधी से अधिक गरीब आबादी के हितों को कोई जगह नहीं मिलेगी, क्योंकि इनसे बिजनेस नहीं हो सकता। हाँ… खैरात के नाम पर कुछ दिया जा सकता है।

 

सबकुछ कारपोरेट के हवाले… बाजार की शक्तियों के अधीन। बाजार की शक्तियां कितनी अमानवीय होती हैं, इनके नियम कितने निर्मम होते हैं… 135 करोड़ आबादी में 100 करोड़ से अधिक गरीब लोगों के साथ इनका कैसा रिश्ता होगा, इन पर विमर्श हो ही नहीं रहा।

 

राजनीति का जनविरोधी हो जाना इस समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। तो, दिल्ली के कनाटप्लेस में घूमने वालों से लेकर दंतेवाड़ा के बियाबान में जिंदगी से जूझने वालों तक, जुहू के बंगलों से झांकती चमकती निगाहों से लेकर कोशी क्षेत्र की झोपड़ियों से झांकती सूनी आंखों तक… सब को इंतजार है… भारत दुनिया की सर्वाधिक मुक्त अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है। अब किसको क्या मिलेगा…यह अभी से तय है। बस, समझ नहीं पा रहे हम।

 

नोट- इसे हेमंत कुमार झा ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है।

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